शतावरी की खेती से पैसे कमायें |Shatavari ki Kheti (Farming Business Plan) in Hindi

शतावरी की खेती से पैसे कमायें, कैसे करते हैं, तरीका, किस्म,निवेश, कमाई, लाभ [Shatavari ki Kheti Kaise Karen in Hindi] (Farming Business, Plan, Risk, Profit, Cost, Investment, Time, Location, Types, Climate, Water)

कोरोना के इस महामारी ने देश की हर एक छोटे बड़े कस्बे के लोगों की नौकरियों को उनसे छीन लिया है और अब देश में सबसे बड़ी आर्थिक मंदी की समस्या उत्पन्न हो रही है। ऐसे में सभी लोग अब आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहे हैं और इसके लिए वे अपने गांव घरों में रहकर आधुनिक खेती करने पर विचार कर रहे हैं. और इसी से एक अच्छी कमाई करने का रास्ता बनाना चाहते हैं। आजकल लोग औषधि युक्त पेड़ पौधों की खेती करना चाहते हैं और यह खेती के कार्य क्षेत्र में अत्यधिक कमाई करने का भी एक रास्ता बन रहा है। अगर आप भी एक औषधि युक्त अच्छी कमाई प्रदान करने वाले खेती पर विचार कर रहे हैं तो आप शतावरी की खेती करके सालाना एक अच्छी इनकम कर सकते हैं। आज के इस लेख में हम आपको शतावरी की खेती करने से संबंधित सभी प्रकार की महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान करेंगे।

shatavari farming business in hindi

Table of Contents

शतावरी क्या है

शतावरी एक प्रकार का औषधि युक्त बहुत ही महत्वपूर्ण पौधा है। शतावरी लिली ऐसी कुल का एक औषधि के गुणों से युक्त पौधा है, इसका शाब्दिक अर्थ पत्तों वाले पौधों से है। शतावरी के पौधे का उपयोग अनेकों प्रकार की दवा को बनाने में किया जाता है। शतावरी का पौधा अनेक शाखाओं से युक्त होता है और उसके साथ-साथ कांटेदार लताओं के रूप में 1 से 2 मीटर लंबा होता है, इस पौधे की जड़ गुरु के रूप में होती है।

शतावरी के पौधे की एक अन्य प्रजाति हिमालय में पाई जाती है, यह प्रजाति हिमालय में 4 से 9 हजार फिट की ऊंचाई तक मिलता है। हिमालय में पाया जाने वाला शतावरी का यह पौधा शाखाओं और कांटो से रहित होता है, अर्थात यह सीधा और बिना कांटे वाला पौधा है।

शतावरी के पौधे का वानस्पतिक नाम

  • साधारण जलवायु में पाए जाने वाले शाखाओं और कांटो से युक्त शतावरी के पौधे का वनस्पतिक नाम एस्पेरेगस रेसिमोसस होता है।
  • इसके विपरीत हिमालय में पाए जाने वाले सीधे एवं कांटो से रहित शतावरी के पौधे का वनस्पतिक नाम एस्पेरेगस फिलिसिनस है।

शतावरी के पौधे किन देशों में पाया जाता है (Location)

औषधि के गुणों से युक्त शतावरी का पौधा भारत के साथ-साथ श्रीलंका और पूरे हिमालयी क्षेत्र में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

शतावरी फसल की किस्में (Type)

इस फसल की मार्केट में कोई चर्चित किस्म अब तक विकसित नहीं की गई है, इस फसल की जे. एस. 1 मार्केट में सबसे ज्यादा चर्चित किस्म है। मार्केट में इसी किस्म की अलग-अलग क्वालिटी आपको देखने को मिल जाएगी। इसी किस्म की अलग-अलग क्वालिटी से फसलों के उत्पादन में काफी प्रभाव पड़ता है।

शतावरी की खेती करने के तरीके (Plan)

सतावर की खेती करने के लिए अनेकों प्रकार के कंडीशन होते हैं। कंडीशन को फॉलो करके आप शतावरी की खेती काफी अच्छे तरीके से कर पाएंगे और काफी उत्पादन भी प्राप्त कर पाएंगे। यदि आप चाहते हैं, कि इस औषधि युक्त पौधे की उत्पादकता में वृद्धि और सके तो नीचे बताए गए चरणों का पालन करें।

शतावरी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी (Climate)

शतावरी की खेती करने के लिए सबसे अधिक प्राथमिकता लेटराइट लाल दोमट मिट्टी को दिया जाता है। इस मिट्टी में उचित जल निकासी की सुविधा होती है, इसीलिए इसे शतावरी की खेती के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अतिरिक्त शतावरी की खेती शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है। ऐसे क्षेत्रों में पर्वतीय क्षेत्र जैसे कालरेयान, शेवरोज और पश्चिमी घाट के मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है।

शतावरी की खेती के लिए खेत की तैयारी और फसल की रोपाई

सतावर की खेती करने के लिए जुलाई का महीना सर्वोत्तम माना जाता है। इसी महीने में हमें शतावरी की खेती करने के लिए अपने खेत को तैयार कर लेना चाहिए। शतावरी के व्यवसायिक खेती के लिए बीजो की तुलना में शतावरी के छोटे पौधों को काफी प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि छोटे पौधे लगाने से शतावरी की फसल काफी अच्छी तैयार होती है। शतावरी के फसल की रोपाई भी धान के फसल के जैसे ही की जाती है।

शतावरी के फसल को सिंचाई की आवश्यकता (Water)

शतावरी के फसल की रोपाई हो जाने के तुरंत बाद खेत की सिंचाई कर देनी चाहिए। पहली सिंचाई के ठीक एक माह बाद हमें नियमित रूप से 4 से 5 दिन के अंतराल पर सदैव सिंचाई करते रहना चाहिए। नियमित रूप से दो से तीन बार सिंचाई करने के बाद एक हफ्ते के अंतराल पर सिंचाई करनी आवश्यक होती है।

फसल के अच्छे उत्पादन के लिए खरपतवार नियंत्रण

शतावरी की फसल जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे वैसे हमें इसके आरंभिक समय से ही नियमित रूप से खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। खरपतवार निकालते समय हमें एक बात का बहुत ही ध्यान रखना होता है, कि फसल को कोई नुकसान ना हो, क्योंकि यह फसल लताओं से युक्त होती है, जिससे इसकी लताओं के कटने का डर रहता है।

शतावरी के पौधों की सुरक्षा

शतावरी की फसल में कुछ गंभीर कीटनाशक जीव और रोग देखने में नहीं आते है। शतावरी के फसल में रोगों की सुरक्षा के लिए कुछ ज्यादा दवाओं का उपयोग नहीं करना होता है।

फसल की बुवाई से फसल के पकने में लगने वाला समय (Timing)

शतावरी के फसल को तैयार होने में लगभग 18 महीने का समय लगता है, अर्थात इसकी फसल लगभग 18 महीने में तैयार हो जाती है। शतावरी के फसल की बुवाई से 18 महीने बाद हमें इस फसल की गिरी जड़ प्राप्त होती है।

फसल तैयार होने पर प्राप्त उपज

जब फसल तैयार हो जाती है, तो खुदाई करने के बाद हमे शतावरी के फसल की गीले जड़ मिलते हैं, जिन्हें हमें सुखाना होता है। इस फसल को सुखाने के बाद यह लगभग पूरी फसल का एक तिहाई हो जाता है। एक उदाहरण के तौर पर यदि आपके खेत में शतावर की जड़ लगभग 10 किलो हुई है, तो इसे सुखाने के बाद आपको केवल 3 किलो फसल ही मिल पाएगा।

शतावरी की फसल कहां बेची जाती है (Where to Sell)

शतावरी के फसल को दिल्ली, बनारस, लखनऊ, कानपुर, हरिद्वार जैसे विकसित शहरों में बेचा जा सकता है। इसके अलावा आप अपनी फसल को डायरेक्ट आयुर्वेदिक दवा कंपनियों को बेच सकते हैं।

शतावरी की खेती से कमाई एवं लाभ (Earning and Profit)

यदि आप अपने फसलों को बाजारों में बेचते हैं तो आपको कम लाभ होता है अर्थात यदि आप की फसल अच्छी है, और आपने मार्केट में लगभग 10 क्विंटल फसल को बेचा, तो आपको बड़ी ही आसानी से लगभग ₹3,00,000 की कमाई हो जाती हैं। यदि आप की फसल की गुणवत्ता कम मानी जाती है, तो भी आप लगभग ₹2,00,000 तक कमा लेते हैं।

यदि आप अपनी फसल को डायरेक्ट आयुर्वेदिक दवा कंपनियों को बेचते हैं, तो आप 10 कुंटल फसल के ही लगभग ₹4,00,000 रुपए तक पा सकते हैं, यदि आपके फसल की क्वालिटी अच्छी नहीं मानी जाती है तो भी आप लगभग ₹2,50,000 तक कमा सकते हैं।

शतावरी रोग औषधि

  • पेशाब में होने वाले जलन को कम करने के लिए
  • महिलाओं के स्तन्य की मात्रा बढ़ाने के लिए
  • दर्द कम करने के लिए
  • पाचन संबंधी बीमारियों के इलाज में
  • ट्यूमर के इलाज में
  • वजन बढ़ाने में
  • गले के संक्रमण को कम करने के लिए
  • भूख कम लगने की स्थिति में
  • अनिद्रा में

शतावरी की खेती में निवेश (Investment/ Cost)

अगर आप शतावरी की खेती करते हैं, तो आपको इसमें ज्यादा कुछ निवेश करने की आवश्यकता नहीं है। इसकी बुवाई का खर्चा और खेतों में सिंचाई का जो भी खर्च लगे वही आपकी इसमें मुख्य लागत होगी। फिर भी कुल मिलाकर एक अनुमान के अनुसार आपको इसकी खेती को करने के लिए लगभग 10 से 5 हजार रुपए का न्यूनतम 1 एकड़ के खेती के अनुपात के हिसाब से निवेश करना होगा।

शतावरी की खेती में जोखिम (Risk)

जैसा कि हमने इस लेख के शुरुआत में ही आपको बताया था कि सतावर के जरिए अनेकों प्रकार की गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दवाइयों का निर्माण किया जाता है और इतना ही नहीं इसे दवाई के बिना ही कई घरेलू उपाय में भी इस्तेमाल किया जाता है। कुल मिलाकर अगर हम इस विषम परिस्थिति में सतावर की खेती करें, तो हमें इसकी खेती में बहुत ही कम जोखिम मिलेंगे और इसकी मांग अलग-अलग क्षेत्र में अत्यधिक है, इसलिए हमें इससे केवल मुनाफा ही प्राप्त होगा।

आज के इस लेख में हम सभी ने जाना, कि शतावरी क्या होता है?, सतावर की खेती कैसे करें?अपनी फसल को कहां बेचे?। हम उम्मीद करते हैं, कि सभी किसान भाइयों के लिए हमारा यह लेख काफी फायदेमंद सिद्ध हुआ होगा।

FAQ

Q : क्या आज के इस आर्थिक मंदी में सतावर की खेती करना लाभकारी सिद्ध होगा ?

ANS : जी हां बिल्कुल।

Q : सतावर के पौधे की सिंचाई कब कब करना अनिवार्य है ?

ANS : नियमित रूप से 4 से 5 दिनों के अंतराल में।

Q : सतावर की फसल कितने समय में तैयार हो जाती है ?

ANS : 18 महीने में।

Q : सतावर के बीज कहां कहां पर बेचे जाते हैं ?

ANS : दिल्ली, वाराणसी, लखनऊ, कानपुर और हरिद्वार।

Q : सतावर की खेती करके सालाना कितनी इनकम की जा सकती है ?

ANS : सालाना 4 से 5 लाख रुपए।

अन्य पढ़ें –

Latest articles

Similar articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here